Tuesday, February 2, 2010

मेरी उम्मीद,Rafatji


एक और हार ने दिखाए हैं मुझे सपने नए...
उठने की फिर चाह जगी जब हम थक कर हम गिर गए
गैरों से शिकायत क्या करें जब साथ न दिया अपनों ने
उसको हकीकत न बना सके जो पल दिया था सपनो ने

इस दिल मैं अनजानी सी एक चाह अभी बाकि है
मंजिलें बदल गयी पर राह अभी बाकी है
मेरे होसलों को किस क़दर यह ज़िंदगी आजमा रही है
जिसकी है मुझे तलाश क्यों वो घडी मुझसे पास आ कर दूर जा रही है

नाउम्मीदी यह बता दे तू कब तक मुझ से वफ़ा रखेगी
मेरी उम्मीद आवाज़ दे रही है कभी तो गुमनामी की छाया मुझ से हटेगी

FaceBook Icon

2 comments:

Sam said...

Really Inspiring....

Brajesh Pawar said...

bahut badiya hai